Thursday, May 12, 2022

मां शारदे वरदे, शरण हैं......


  • By योगेश थवाईत जशपुर

मां शारदे वरदे, शरण  हैं ,

अज्ञान तिमिर, भग्न अंतस्थल।।

रहा‌ न सूझ श्रेय-पथ अविचल,

मोह निशा व्यथित हैं पल पल ।।


माता कल्याणमयी पुत्र तव,

विलख रहे अज्ञान गहन  है।।

वीणा मौन है , पवन स्तब्ध है,

विपति विषम‌ है, मातु शरण दे।।


ज्ञान यज्ञ अभियान चले मां ,

" वसुधैव कुटुंबकम् " रीति रहे ,

क्षमता  ऐसी  देना  माता ,

" सर्वे सुखिन: सन्तु " लक्ष्य बने।।


वीणा के स्वर झंकृत हो मां ,

"नाद-योग" रस में रम जाएं।।

हृदय द्रवित हो , प्रभु उन्मुख हो। ,

जिमि सरिता सागर को धाए।।


माता ममतामयी विनय है ,

निज अंचल की छाया  देना।।

पथ दुरूह , मंजिल अबूझ है ,

कृपा-अनुग्रह- संबल देना ।।


" परोपकाराय सतां विभूतय: " ,

पाथेय दयामयि हम पाएं ।।

ब्रह्म-नाद में सम स्वर होकर ,

ब्रह्म- निलय के रस रंग जाएं।।

   योगेश थवाईत, जशपुर 

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Monday, October 18, 2021

संवेदना के स्वर :"सुशासन" को "आईना" दिखाकर ,"नाटु" तुमने "इतिहास" रच दिया, "तुम्हें तो बहन की शादी करानी थी,सबको छोड़कर,"तुम कहाँ चल दिए " ..? वह पहलु जिसे अब तक आपने नहीं जाना,पत्थलगांव से लौटकर ....जानिए योगेश थवाईत की कलम से ....."जब मेहंदी लगाने वाले हाथों ने दी अपने भाई को अंतिम विदाई" ...

 


BY योगेश थवाईत,पत्थलगांव से लौटकर ....

पिछले तीन दिनों में करीब से पता चला कि गौरव अग्रवाल जिसे लोग प्यार से "नाटु"कहकर बुलाते थे।कद में छोटा होने के कारण वह प्यारा था और सबका चहेता भी था।लोगों के प्यार ने उसे "नाटु" बना दिया।यही वह चर्चित चेहरा था जो अब हम सबके बीच नहीं रहा।दुल्हनों के हाथों को मेहंदी से सजाने वाली बहन के हाथों ने अपने भाई को अंतिम विदाई थी।रुंधा गला,नयनों में अश्रु की धार,बेसुध होकर एक टक अपने भाई को निहारती उम्मीद भरी नजरें आज भी जीवंत बनीं हुई हैं

छत्तीसगढ़ में जशपुर जिले के पत्थलगांव में हुए भीषण घटना को कव्हर करने के दौरान स्थानीय लोगों से जो सुनने को मिला वह वैसा का वैसा आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ ...पत्थलगांव के प्रदीप ठाकुर बताते हैं ..

नाटु ऐसा लड़का था जो हमेशा खुशमिजाज रहता था,सबका सम्मान करना और सम्मानित शब्दों में बात करना उसकी खासियत थी।कोई उसे बुरा कह दे तो भी वह बुरा नहीं मानता था।हर किसी के दिल में उसके लिए स्नेह का भाव था। 

हर किसी ने यह जाना कि घटना कैसे हुई ..? कैसे एक कार हाहाकार बनकर आई और एक परिवार को उजाड़ते हुए  निकल गई ...कईयों ने उस दिन मौत का एहसास किया करीब से जाना कि मौत क्या होती है ...इन सबके बीच जब हम उस शोक संतप्त परिवार से मिलने पंहुचे तो पता चला कि स्वर्गीय गौरव के पिता मनोज अग्रावल 4 साल पहले ही एक हादसे में गुजर चुके हैं।जिस लड़के गौरव अग्रवाल की मौत हुई है उसकी उम्र मात्र 18 साल थी। पिता मनोज अग्रावल की मौत के बाद घर मे कुल 4 सदस्य थे। अब परिवार में कुल 3 लोग बचे हैं।जिसमें एक बड़े भाई चाहत और एक बड़ी बहन शिप्पी और माँ घर में बचे हैं।दोनों भाई मिलकर कपड़े का व्यवसाय करते थे।इसी दुकान में दोनों भाई बैठते थे। 

इस पुरे घटनाक्रम में सबसे दुखद पहलु यह रहा कि जब परिवार सम्हाल रहा था जब परिवार में खुशियाँ आने वाली थी तब यह बड़ी मुसीबत आ गई और गौरव काल के गाल में समा गया।आपको बता दें कि बड़ी बहन शिप्पी अग्रवाल की शादी 21 नवम्बर को होनी है। बहन पार्लर का काम करती है और घर घर जाकर शादी में मेहंदी का काम करती है।गौरव के जाने से शादी के माहौल वाले घर में जो मातम पसरा हुआ है उसे शब्दों से बयां कर पाना बेहद मुश्किल है इस घटना से हर कोई सदमे में है।जिन हाथों में मेहंदी सजनी थी उन्हीं हाथों ने अपने भाई को पुष्पांजलि अर्पित कर अंतिम विदाई दी।

संवेदना के स्वर तब झंकृत हो उठे जब बार बार चाहकर भी मन इस घटना को भुलाने में अक्षम बना रहा। आँखों के सामने नाटु की जलती चिता बस यही पुछ रही थी मेरा कसूर क्या था ...?  क्यूँ मुझे अपनों से दूर होना पड़ा,क्यूँ मुझे भगवान ने अपने पास बुला लिया ....? मैंने मन ही मन कहा नाटु तुम निश्चल थे,सबके प्यारे सबके चहेते थे,न तुम द्वेष जानते थे न दुर्गुण,भोलेपन की पराकाष्ठा तुम्हारे चरित्र का दर्पण था ....शायद तुम्हें मातारानी तुम्हे कोई बड़ी जिम्मेदारी देना चाहती होगी ...इसलिए उन्होंने तुम्हें अपने पास बुला लिया ..!

जब नाटु के साथ कर्मा नृत्य में शामिल घायलों के हक़ में आवाज उठाने की बारी आई तो पत्थलगांव शहर में जबरदस्त संवेदना दिखी।आह्ववान किसी ने भी किया पर साथ हर वर्ग ने हर समाज ने दिया यह पत्थलगांव नगरवासियों की संवेदना थी जिसके कारण शासन से लेकर प्रशासन,विधायक से लेकर मुख्यमंत्री तक दबाव बना हुआ था।कोई मौन जुलुस कर रहा था तो कोई हल्ला बोल रहा था,कोई नारे लगाकर गुस्सा निकाल रहा था तो कोई मुर्दाबाद के नारे लगाकर सरकार को कोस रहा था।इसे खीझ कहें,गुस्सा कहें या आक्रोश ..जिस प्रकार से घटना हुई वह ह्रदय विदारक थी ...."न भूतो,न भविष्यति" ...अब कभी शायद ऐसा न हो क्यूंकि..?

आज गौरव ने सरकार को आईना दिखाने का काम किया है।नाटु ने न केवल प्रशासन की आंखे खोलीं हैं बल्कि पुरे सिस्टम को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।आज हर कोई जिम्मेदार यह सोचने पर मजबूर है कि उससे चूक कहाँ हुई ...क्यूँ हुई ...क्या करते तो ..तो यह घटना नहीं हुई होती .....ऐसे तमाम सवाल आज मुंह चिढाते नजर आ रहे हैं।

15 अक्टूबर 2021 का दिन एक इतिहास रच गया।गौरव की मौत ने न केवल सिस्टम को हिलाकर रख दिया है बल्कि एक नए सिस्टम को खड़े करने की दिशा में उसने अपने आप को बलिदान कर दिया है।घटना का दोष किस पर मढें यह विषय नहीं इस घटना के बाद कभी ऐसा न हो इसके लिए प्रयास आवश्यक है।गौरव की मौत के बाद भी विश्वास नहीं होता कि सबका चहेता अब सबसे दूर जा चुका है।

आज पत्थलगांव की मातृशक्ति ने कैंडल जलाकर नाटु को श्रद्धांजलि अर्पित की।हाथों में कैंडल,आँखों में आंसु और ह्रदय में संवेदना के स्वरों ने अपने गौरव को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। 

बस सुक्ष्मसत्ता से इतनी प्रार्थना है कि इस दुःख की घड़ी में शोक संतप्त परिवार को संबल प्रदान करें,दुखों से लड़ने की शक्ति प्रदान करें ...और गौरव को ब्रम्ह्लोक में स्थान दें ....ॐ शांति .....


इस पोस्ट को पढ़ने के बाद  नीचे कमेन्ट बाक्स में आप भी नाटु को आप अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर सकते हैं 

Wednesday, October 13, 2021

स्वतंत्र लेख : रावण पर ये कैसी राजनीति : "रावण पर भी राजनीति गरमा रही है,खड़े दशानन को भी शर्म आ रही है".. मैं तो बुराई का प्रतीक हूँ ,इसलिए जल रहा हुं "शुक्रगुजार हूं" मेरी जलन आपका वोट बैंक बना रही है,शक्ति संचय की महापूर्णाहूति पर "मेरा तमाशा क्यूँ"

 



जशपुर,13 अक्टूबर 2021

BY योगेश थवाईत

जब कुत्सित राजनीति हावी हो जाए,समाज में अशांति, अराजकता की स्थिति दिखने लगे तो लेखक की लेखनी और कवि के भाव मौन होकर नहीँ रह सकते।जशपुर जिले के कुनकुरी में इन दिनों जाति बंधनों को मुद्दा बनाकर रावण दहन पर जमकर राजनीति की जा रही है जिससे हर वर्ग आहत है।इस लेख का ध्येय बस इतना है कि जाति बंधनों पर राजनीती न करते हुए शांतिपूर्ण माहौल में हम असत्य पर सत्य की पताका लहराएं

रावण का दहन कौन करे यह महत्वपूर्ण नहीं बल्कि जरुरी यह है कि बुराई के प्रतीक,असत्य पर सत्य की जीत के पर्व को कितने आत्मीयता,हर्षोल्लास,शांति और शौर्य के साथ मनाया जाए।लिखने को बहुत कुछ है फिलहाल हमारे एक अभिन्न मित्र की रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ इससे शायद कुछ हद तक आप समझ सकें .....

रावण पर भी राजनीति गरमा रही है,खड़े दशानन को भी शर्म आ रही है,

मैं तो बुराई का प्रतीक हूँ ,इसलिए जल रहा हुं

"शुक्रगुजार हूं"

मेरी जलन आपका वोट बैंक बना रही है


मुझे जलाओ खुशीयां मनाओ, 

मेरी एक बुराई का तमाशा बनाओ

पर जरा खुद पर भी झाँकना


आप में क्या पवित्रता है,उसको भी आँकना

याद रखना ज्ञानियों

मेरा अंत तो श्री राम के हाथों हुआ

आपसे होता देख,जातिवाद की बू आ रही है

खड़े दशानन को भी शर्म आ रही है

रावण पर भी राजनीति गरमा रही है

यह तो बस कवि की भावना है इसे आप जिस रुप में समझ सकें समझ लें।नवरात्र के नौ दिन शक्ति की उपासना हमें बस इतना सिखाती है कि इस साधना के दौरान संचित उर्जा,संचित शक्ति का सदुपयोग हम शांति,सेवा और समाज के नवनिर्माण में अधिक से अधिक कर पाएं। 

रही बात रावण के पांडित्य की तो वह अलग विषय है जिसमें बैठकर चर्चा की जा सकती है।रावण के दहन में राजनीति और राजनीती में यज्ञोपवीत जनेऊ जैसे  पवित्र आध्यात्म को लाना कहीं न कहीं सनातन परंपरा के उत्कृष्ट राजतंत्र पर सवाल खड़े करता है।सनातन परंपरा रही है जिसमें जाति,धर्म को लेकर राजनीति नहीं की गई बल्कि धर्मतंत्र से उत्कृष्ट राजतंत्र को चलाया गया।हांलाकि धर्म की चिंता हर सनातनी को करनी चाहिए यह आवश्यक भी है।वर्तमान समय में राजनीति का जो दूषित रुप देखने को मिल रहा है जो चिंता का विषय है।समस्या यह नहीं कि हम किस समाज के साथ खड़े हैं कौन हमारा साथ देता है बल्कि समस्या यह है कि हमें कहाँ मौका मिल जाए और हम अपना वोट बैंक बना लें अपनी राजनीति चमका लें।

प्रेम,सौहार्द्र के साथ आत्मीयता को शिरोधार्य करना सनातन परंपरा का अंश रहा है जिसे हम भूलते जा रहे हैं।जब सकारात्मक उर्जा हावी होती है तो वह बिना जाति बन्धनों के सबका कल्याण करती चली जाती है वह कोई भेदभाव नहीं करती फिर ऐसी कौन सी नकारात्मक शक्ति हमपर हावी है जो हमें भेदभाव के रास्ते की ओर धकेलती चली जा रही है यह सोचने का विषय है।

राजनीति के लिए हमारे पास तमाम मुद्दे भरे पड़े हैं जिनपर पक्ष विपक्ष दोनों खामोश रहते हैं इसके बावजूद ऐसे मुद्दे ढूंढे जाते हैं जिससे जाति,समाज को एकजुट किया जा सके अपनी राजनीति चमकाई जा सके।

हांलाकि यहाँ मुद्दा रावण दहन का है जिसपर राजनीति करना कहीं से भी ठीक प्रतीत नहीं होता ऐसे में जरुरत है ऐसे पहल की जिससे समाज में शांति,सद्भाव और भाईचारे के साथ रावण दहन कर असत्य पर सत्य की पताका लहराई जा सके।

Monday, July 5, 2021

स्वतंत्र लेख : सावधान ! "विकास के क़गार" पर "महाविनाश की तैयारी" "पर्यटन उद्योग" की तमाम संभावनाओं के बावजूद,जशपुर की शांत फिजा में "जहर घोलने" की तैयारी हुई पुरी,चंद महीनों में "स्टील उद्योग की स्थापना",जिले को बरबाद करने की किसने रची साजिश ...? कौन किसके साथ ..? जनता के सामने बड़ा सवाल ..?

 


 योगेश थवाईत

"जशपुर की खनिज सम्पदा हमारा फिक्स डिपोजिट है" मेरे जीते हुए कभी यहाँ कोई भी औद्योगिक स्थापना नहीं होगी यह बातें स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव कहा करते थे।वाकई अपनी सोच और अपने दृढ़ता के दम पर उन्होंने कभी उद्योगपतियों  को यहाँ पैर पसारने का मौका नहीं दिया।शासन सत्ता बदलने,पद प्रभाव कम होते ही अब उद्योगपतियों की मंशा इस हरे भरे खुबसूरत वादियों को धूल धूसरित करने की है।यहाँ के नैसर्गिक सौन्दर्य को बिगाड़ते हुए प्रकृति से सीधा टक्कर लेने की तैयारी उद्योगपति कर चुके हैं।ये समझ से परे है कि जूदेव की दृढ़ता के संवाहक क्यों इससे अनजान बने बैठे हैं या फिर मौन सहमति के साथ इसका समर्थन कर रहे हैं ? हांलाकि मुद्दा अब किसी एक का नहीं रह गया इसके लिए समूचे जशपुर के साथ पक्ष विपक्ष को अपनी भूमिका तय करनी होगी जिससे इस महाविनाश से जशपुर को बचाया जा सके।

अब सीधे मुद्दे पर आते हैं।बीजेपी की 35 वर्षों की राजनीति के बाद भी जशपुर जिले को पर्यटन के क्षेत्र में स्थान नहीं मिल पाया।वहीँ कांग्रेस की सरकार आते ही पर्यटन के मानचित्र में तो जशपुर स्थापित हो गया और यहाँ के पर्यटन स्थलों की नई पहचान का कार्य भी शुरु कर दिया गया नए आयाम भी विकसित होने लगे और अब इस सम्भावना पर ग्रहण लगता नजर आ रहा है।

ग्रीन बेल्ट रह गया सपना बन रहा अब रेड जोन

हांलाकि तब बीजेपी के शासनकाल में यहाँ उद्योगों को स्वीकृति नहीं मिली थी और अब तो औद्योगिक स्थापना के साथ खनन तक की स्वीकृति अंतिम चरण में है।अब जब पर्यटन के क्षेत्र में विकास की नई संभावनाओं के साथ जशपुर विकास के मुहाने पर खड़ा है तो जशपुर की शांत फिजा में जहर घोलकर उसे बरबाद करने की तैयारी उद्योगपतियों ने कर ली है।जमीन खरीदी के साथ चंद महीनों में यहाँ लौह उद्योग स्थापित किया जा रहा है जिसकी अंतिम तैयारी पूरी हो चुकी है।अब वह दिन दूर नहीं जब आप शुद्ध ऑक्सीजन के साथ सांस ले सकें।

स्टील प्लांट का काम शुरु

आपको बता दें कि जशपुर जिले के पत्थलगांव विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत कांसाबेल के पुरातात्विक धरोहर हथगड़ा से लगे टांगरगाँव में माँ कुदरगढ़ी एनर्जी एंड इस्पात प्राइवेट लिमिटेड (MKEIPL) द्वारा स्टील प्लांट की स्थापना की जा रही है।सारी तैयारियां लगभग अंतिम चरण में हैं यहाँ तक कि कम्पनी ने अपना ठिकाना तैयार करने का काम भी गाँव में शुरु कर दिया है और आगामी 4 अगस्त को इसकी जनसुनवाई भी प्रस्तावित है।हालांकि ऐसे मामलों में जनसुनवाई महज दिखावा ही होता है जहाँ भोले भाले ग्रामीणों को चंद पैसों का लालच देकर अपने पक्ष में करने का प्रयास किया जाता है। 

क्या है प्रोजेक्ट 

बात करें औद्योगिक स्थापना की तो यहाँ 4 लाख 62 हजार टन प्रतिवर्ष उत्पादन क्षमता का स्पंज आयरन डीआरआई प्लांट,5 लाख 20 हजार टन प्रतिवर्ष उत्पादन क्षमता का बिलेट स्टील मेकिंग शॉप इन्डक्शन फर्नेश प्लांट,5 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता का टीएमटी बार रोलिंग मिल व 70 मेगावाट उत्पादन क्षमता का बिजली कैप्टिव पावर प्लांट स्थापित किया जा रहा है।लगभग 71 एकड़ में उक्त परियोजना  610.7 करोड़ की लागत से स्थापित की जा रही है।

आज भी मौजूद है प्राचीन सभ्यता

कांसाबेल के पुरातात्विक धरोहर हथगड़ा के विषय में 70 वर्षीय प्रेमसिंह बताते हैं उनकी तीन पीढ़ी यहाँ गुजर गई।उन्होंने बताया कि रियासत काल में कभी यहाँ 107 तालाब हुआ करते थे और अब लगभग दर्जन भर तालाब यहाँ मौजूद हैं।यहाँ के विषय में पुरातत्वविदों का कहना है कि पहले यह हस्तगढ़ के नाम से प्रसिद्ध था।जब इसका कारण जानने का प्रयास किया गया तो पता चला कि यहाँ जमीन के नीचे पुरा एक साम्राज्य एक गढ़ दबा हुआ है जहाँ आज भी खनन करने पर प्राचीन मूर्तियाँ व अवशेष मिलते हैं।

वहीँ पत्रकार मोती बंजारा इस क्षेत्र के बारे में बताते हैं कि यह पुरात्विक क्षेत्र है और जहाँ प्लांट की स्थापना हो रही है वह गाँव से लगा हुआ ईलाका है।यहाँ का पुरातन इतिहास है जहाँ रियासतकालीन अवशेष आज भी मिलते हैं ।अविभाजित मध्यप्रदेश में यहाँ तत्कालीन कलेक्टर ने लगभग 30 से 35 एकड़ क्षेत्र को प्रतिबंधित भी किया था।

वैसे भी इस क्षेत्र में स्वर्ण धातुओं की भरमार बताई जाती है।पहले भी यहाँ एक लोहार को 4 किलो सोना मिला था,सोने से भरी हांडी व प्राचीन मूर्तियाँ,शिवलिंग मिल चुकी हैं जिसका कोई अता पता नहीं है।वहीँ गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि यहाँ तालाब में हाथी गड़ने के कारण इसे हाथीगड़ा कहने लगे फिर यह हथगड़ा के नाम से प्रचलित हो गया।

 प्रकृति,पर्यावरण के साथ वन्यजीवों पर सीधा प्रभाव 

इस प्रोजेक्ट की स्थापना के साथ पर्यावरण को सुरक्षित रखने के तमाम दावे किये जा रहे हैं।वहीँ इस परियोजना को हरी झंडी मिलने से यहाँ के प्राकृतिक वातावरण के साथ पर्यावरण को भी ख़ासा नुकसान होगा।वन्यप्राणी के जानकार पर्यावरण प्रेमी रामप्रकाश पाण्डेय ने बताया कि जहाँ यह प्लांट स्थापित किया जा रहा है वहां से महज 2 से 5 किलोमीटर की दुरी पर हाथियों का गलियारा है।जशपुर जिले में हाथियों के दो रुट हैं जिसमें ओड़ीशा से तपकरा फरसाबहार सीतापुर मैनपाट हाथियों की चहलकदमी रहती है वहीँ बादलखोल से कुनकुरी,कांसाबेल,पंडरीपानी, खूंटापानी,झिम्की, कोकियाखार,जामझोर,अम्बाकछार,कोतबा होते हुए तुमला और लुड़ेग से मठपहाड़ होते हुए चिकनीपानी,रेडे, जमरगी,सेमरकछार,केंदुटोला,शबदमुंडा होते हुए फरसाबहार, दुलदुला की ओर हाथी विचरण करते हैं।

इसके साथ ही स्टील प्लांट के लिए मैनी नदी से पानी लेने की तैयारी है आपको बता दें की मैनी एकमात्र जीवनदायिनी नदीं है जो पुरे क्षेत्र को सिंचित करती है।जिसपर सैकड़ों किसान आश्रित हैं वहीँ प्लांट से निकलने वाले प्रदुषण की कल्पना से ही भयावहता परिलक्षित होती है।

बहरहाल इस विषय पर जितना लिखें कम है आगे लेखनी चलती रहेगी अब समझना होगा कि जशपुर जिले में एक स्टील उद्योग की स्थापना के साथ वह दिन दूर नहीं जब पत्थलगांव से लेकर जशपुर तक और कांसाबेल से लेकर पाठ के सुदूर वनांचल तक कुकुरमुत्तों की तरह उद्योग स्थापित हो  जाएँगे।

तत्काल पैसे व नौकरी का लोभ,प्रलोभन  देकर काम शुरू करने के बाद भविष्य की पीढ़ी प्रदुषण के साथ नारकीय जीवन बिताने पर मजबूर हो जाएगी और जशपुर को ग्रीन जोन बनाने का सपना धरा का धरा रह जाएगा।इस गंभीर मुद्दे पर आगामी 4 अगस्त को जनसुनवाई होनी है निश्चित ही उर्जावान लोग इसका खुलकर विरोध भी करेंगे।इसके साथ हमें समझना होगा कि ऐसे औद्योगिक प्रगति से हमारे भविष्य का विनाश सुनिश्चित है।

अब देखना होगा कि जशपुर को सुरक्षित रखने के लिए आपका अगला कदम क्या होगा ? यहाँ  के स्थानीय लोगों के साथ क्षेत्र के विधायक, नेता, सांसद, जनप्रतिनिधि, पक्ष,विपक्ष,पत्रकारों,समाजसेवियों के साथ पर्यावरण प्रेमी अपने जशपुर को ग्रीन जशपुर बनाने के लिए क्या करते हैं ? कैसे इस महाविनाश से जशपुर को बचाते हैं..?

अगली बार इसी मुद्दे के साथ .....फिर ...मिलेंगे...

आप लेख के बारे में अपने सकारात्मक नकारात्मक विचार नीचे कमेन्ट बॉक्स में पब्लिश कर सकते हैं...

  

Wednesday, June 9, 2021

स्वतंत्र लेख : "भ्रष्टाचार" की "जड़ों" को सींचता "जशपुर" योगेश थवाईत की कलम से .......

 


बात करें जशपुर जिले की तो एक अति दुर्गम,आदिवासी बाहुल,प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण,पिछड़े हुए क्षेत्र की परिकल्पना मूर्त रूप लेकर मष्तिष्क पटल पर चित्रित हो जाती है।यहाँ के सहज सरल और सीधेपन का लाभ निश्चित ही यहाँ की राजनीति को मिलता आया है और सतत मिलता रहेगा।जिस भविष्य की सुन्दर परिकल्पना के साथ जिले का गठन हुआ तब से लेकर आज तक उस स्तर तक जिले का विकास नहीं हो पाया जितना होना चाहिए

1 नवंबर 1956 को जब मध्य प्रदेश को भारत के एक नए राज्य के रूप में संगठित किया गया,तभी से जशपुर इसका हिस्सा बन गया। 25 मई 1998 तक जशपुर रायगढ़ जिले का एक हिस्सा बना रहा। मध्य प्रदेश के कई जिलों के व्यापक क्षेत्र के कारण 1992 में एमपी के मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने राज्य में 16 नए जिले का गठन किया,जशपुर उनमें से एक था। न्यायिक हितों के कारण तत्काल इसकी घोषणा नहीं हुई और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 22 मई 1998 को 16 जिलों के निर्माण का ऐलान किया। जिसके बाद जिले के प्रभारी मंत्री श्री चनेश राम राठिया ने औपचारिक रूप से घोषणा की और जशपुर जिला 25 मई 1998 को अस्तित्व में आ गया

लगभग 22 वर्षों का लम्बा समय गुजरने के बाद भी जशपुर का चंहुमुखी विकास नहीं हो पाया।देखा जाए तो तमाम संभावनाओं के बावजूद आज तक जशपुर का स्वतंत्र अस्तित्व किसी एक क्षेत्र में स्थापित नहीं हो पाया।हांलाकि शासन प्रशासन कुछ छोटे बड़े कार्यों से सुर्ख़ियों में बना रहता है।मूलतः जमीनी हकीकत यही है जो सोचने को मजबूर करती है कि वाकई विकास हुआ है या बस बात पीठ थपथपाने वाली है

योजनाएं बड़ी बड़ी,वादे उससे भी बड़े बड़े,इरादों में दिखावा भी है,छलावा भी है,पर जब बात करने की आती है तो शुरु होता है भ्रष्टाचार का गन्दा खेल जो वादों इरादों पर पानी फेरकर अपने छलावों से भ्रष्टाचार की जड़ों को सींचने का काम करता है

बात आज की नहीं यह तो इतिहास रहा है और हो भी क्यूँ नहीं परिपाटी कहीं न कहीं से तो शुरु हुई है।बात लेन देन तक समझ आती है कि यह आपका प्रोटोकाल है बिना लेन देन शायद सम्बन्ध भी विकसित नहीं होते ऐसे में आपकी भी और देने वाले की भी मज़बूरी है कि वह ऐसा करे

सवाल यह उठता है कि क्या लेन देन के बाद आपकी जवाबदेही ख़त्म हो जाती है।चाहे वह जिले के विकास से सम्बंधित,लोगों की सुविधाओं से सम्बंधित कोई भी कार्य क्यों न हो ..? दरअसल सिस्टम ही कुछ ऐसा है कि कभी शासन आँख बंद कर लेता है तो कभी प्रशासन ..इस बीच लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की आंख थोड़ी बहुत खुली रहती है जिसे पद,पैसे के दम पर दबाने की कोशिश की जाती रही है

मुद्दे सैकड़ों सामने आते हैं पर किसी भी शासन काल में जशपुर का मुद्दा प्रदेश ही नहीं पुरे देश में सुर्खियाँ बटोरता आया है।अब यहाँ के मामले भी हाइप्रोफ़ाईल और आई क्वालिटी के होते हैं।इसके बावजूद अब तक जांच के नाम पर क्या होता है ये सब को पता है।कुछ जाँच के लिए पेटेंट अधिकारी होते हैं जो किसी भी शासन काल में जाँच के मामले में अपनी कला का अद्भुत प्रदर्शन करते हैं।या तो मुद्दों की जांच ठन्डे बसते में चली जाती है या फिर मुद्दे में दोषियों को क्लीन चिट मिल जाती है

अब यहाँ समझने वाली बात यह भी है कि कोई एक दल पार्टी हो तो बात बने यहाँ तो पक्ष हो या विपक्ष थाली में बांटकर खाने की परंपरा बरसों से चली आ रही है।कुछ जिम्मेदार जमीनी नेता समय समय पर उभरते रहते हैं जिन्हें "न ऊधो के लेना न माधो के देना" इसके बावजूद मुखर होकर मुद्दों को सामने लाने का काम करते हैं।उनकी भी एक सीमा होती है जो चरम सुख तक नहीं पंहुच पाते और न ही  मुद्दे को निर्णायक ऊंचाई तक पंहुचा पाते हैं

अब बात करें जड़ों की.. भ्रष्टाचार वाली... जो आज से नहीं बहुत लम्बे समय से जमी हुईं हैं।यह इतना विकराल हो चुका है कि इसे हटा पाना किसी शासन सत्ता प्रशासन के बस का नहीं क्योकि ये तो सिस्टम बन चुका है

चाहे कोई भी सत्ता में हो सबको यही फालो करना है।दरअसल जब इस परिपाटी में जब हम  शामिल होते हैं तो यही भ्रष्टाचार की जड़ों को सींचने का काम करता है।जशपुर को भ्रष्टाचार का गढ़ कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी।कभी यह सत्ता विशेष का गढ़ हुआ करता था यह भी सही है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि गढ़ यूँ ही नहीं बना करते चाहे वह सत्ता का गढ़ हो या भ्रष्टाचार का

सकारात्मक प्रयासों की और रुख करें तो शिक्षा,कृषि व मुलभुत सुविधाओं की ओर कुछ बेहतर कदम बढे हैं वहीँ स्वास्थ्य ,पर्यटन,स्वावलंबन,खेल व सुशासन के साथ कई क्षेत्रों में आज भी हमारे पिछड़ेपन के लिए भ्रष्ट तंत्र ही जिम्मेदार है।इसके साथ ही बड़ा सवाल आज भी बना हुआ है कि "क्या विहड़ता को सुगमता" में बदलने के बावजूद हम विनाश के मुहाने से दूर हैं ....?

अगली बार किसी नए मुद्दे के साथ .....फिर ...मिलेंगे...

आप लेख के बारे में अपने सकारात्मक नकारात्मक विचार नीचे कमेन्ट बॉक्स में भेज सकते हैं...

मां शारदे वरदे, शरण हैं......

By योगेश थवाईत जशपुर मां शारदे वरदे, शरण  हैं , अज्ञान तिमिर, भग्न अंतस्थल।। रहा‌ न सूझ श्रेय-पथ अविचल, मोह निशा व्यथित हैं पल पल ।। माता कल...